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गिरि पुत्र संवाद से स्वर्ण आंध्र का संकल्प: जनसेना के 13 वर्ष और विकसित भारत की नई राह

Article by:

Dr. Abhishek Saurabh

A BHU-JNU Alumunus,
(Independent Thinker, Analyst, and Critic)
Mobile: 7011091782
Email: [email protected]

भारतीय राजनीति में किसी सत्ताधारी या स्थापित पार्टी का ‘स्थापना दिवस समारोह’ सामान्यतया शक्ति प्रदर्शन, भव्य रैलियों और गुंजायमान नारों का पर्याय बनने के लिए जाना जाता रहा है। चुनावी राजनीति के मद्देनजर शक्ति प्रदर्शन की होड़ में इस तरह के उत्सव, जिन्हें मुख्य रूप से दल विशेष की स्थापना के उद्देश्यों और उनके द्वारा संपन्न किए जा रहे जन कार्यों की समीक्षा पर केन्द्रित होना चाहिए; अक्सर सत्ता के गलियारों और बड़े शहरों के मंचों तक सीमित रह जाती हैं। हालाँकि यह जानना सुखद कहा जा सकता है कि जनसेना पार्टी के अध्यक्ष और आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण ने इस परंपरा को तोड़ते हुए एक नई मिसाल पेश की है। जनसेना के 13वें स्थापना दिवस (14 मार्च, 2026) के अवसर पर, उन्होंने भव्य समारोहों की बजाय जनजातीय बहुल अल्लूरी सीताराम राजू जिले के दुर्गम क्षेत्रों में ‘गिरि पुत्रों’ के साथ समय बिताने का निर्णय लिया। उन्होंने देश के इस सुदूर जिले के दुर्गम अंचलों में न्यूनतम संसाधनों के बीच जीवनयापन कर रहे आदिवासी समाज के लोगों के बीच जाकर न केवल उत्सव मनाया, बल्कि राजनीति के उस ‘गांधीवादी उपागम’ को पुनर्जीवित किया जो आधुनिक युग में ओझल होता जा रहा था।

• ‘गिरि-पुत्र संवाद’, ‘माता-मंती’, व ‘अडवितल्ली बाटा’ पहल
महात्मा गांधी का मानना था कि ‘सच्चा भारत गाँवों में बसता है’ और विकास की वास्तविक कसौटी ‘कतार में खड़े अंतिम व्यक्ति’ का उत्थान है। पवन कल्याण द्वारा पाडेरु निर्वाचन क्षेत्र के नंदीगुरू जैसे सुदूर गांवों का चयन उनकी कार्यशैली में निहित इसी गांधीवादी दर्शन का प्रतिबिंब है। ओनरु जंक्शन पर पार्टी का झंडा फहराने के बाद, सरकारी तामझाम की बजाय 2.4 किलोमीटर लंबी कच्ची सड़कों पर उसका निरीक्षण करते हुए पैदल चलना और आदिवासी महिलाओं के साथ जमीन पर बैठकर बेहद आत्मीय भाव से ‘माता-मंती’ संवाद करना, गांधी जी के ‘जन-संपर्क’ प्रारूपों की मौजूदगी का संकेत है। यहाँ आदिवासियों के पारंपरिक ‘धिमसा’ नृत्य के बीच उनका स्वागत और उसमें शरीक होकर अतीव प्रसन्नता से उनका नृत्य करना एक जमीनी जनप्रतिनिधि और उसका अपनी जनता के प्रति गहरे लगाव का भी द्योतक है। आदिवासी समाज के युवाओं से सीधा मुखातिब होकर उनके नजरिये से उस क्षेत्र विशेष की समस्याओं को समझने की उनकी तत्परता भी काबिलेगौर है। यह सब दर्शाता है कि सत्ता केवल आधिकारिक आदेश देने के लिए नहीं, बल्कि जनता के दुखों को साझा करने और उन्हें दूर करने के लिए है। एक सच्चे जनप्रतिनिधि की भांति, उन्होंने जनजातीय भाई-बहनों के साथ बैठकर दोपहर का भोजन किया। पवन कल्याण का यह कृत्य समाज के अंतिम व्यक्ति के प्रति उनकी आत्मीयता और समानता के भाव को दर्शाता है; और निस्संदेह उनका यह कदम महात्मा गांधी के ‘अंत्योदय’ (अंतिम व्यक्ति का उदय) और ‘ग्राम स्वराज’ के विचारों से मेल खाता है। जहाँ राजनीति अक्सर वोटों के गणित तक सीमित होती है, वहाँ सुदूर पहाड़ों पर जाकर आदिवासियों की सुध लेना जनतांत्रिक दायित्वों और लोक सेवा भाव का अनुपम उदाहरण है।

शाश्वत मूल्यों पर केन्द्रित राजनीति
जैसा कि उनके हालिया बयानों से जाहिर है पवन कल्याण की राजनीति का सबसे अनूठा सिद्धांत ‘सनातन धर्म’ और ‘भारतीय संविधान’ का समन्वय है। जनजातीय क्षेत्रों में उनकी उपस्थिति यह रेखांकित करती है कि सनातन धर्म समावेशी है। आदिवासियों को ‘गिरि पुत्र’ कहकर संबोधित करना और उनकी प्रकृति-पूजक परंपराओं का सम्मान करना, वास्तव में उस शाश्वत संस्कृति को सहेजना है जो आधुनिकता की दौड़ में कहीं पीछे छूट गई है। सनातनी मूल्यों में ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का स्थान सर्वोपरि है। आदिवासियों को ‘गिरि पुत्र’ मानकर उन्हें सम्मान देना इसी समावेशी संस्कृति का हिस्सा है।

जनसेना के 13वें स्थापना दिवस के अवसर पर उनकी नई पहल ‘अडवितल्ली बाटा’ को सराहा जा सकता है। ‘अडवितल्ली बाटा’ का अभिप्राय ‘विकास का पथ’ होता है; हालाँकि इसका शाब्दिक अर्थ है – ‘वन-माता का मार्ग’। यह पवन कल्याण की एक दूरदर्शी पहल है जिसका उद्देश्य आंध्र प्रदेश के सभी सुदूर आदिवासी क्षेत्रों, जैसे अल्लूरी सीताराम राजू जिले के दुर्गम इलाकों में पक्की सड़कों का जाल बिछाकर उन्हें मुख्यधारा के विकास से जोड़ना है। स्थापना दिवस पर अल्लूरी सीताराम राजू जिले के दुर्गम आदिवासी क्षेत्रों में पवन कल्याण ने पीएम जनमन और जल जीवन मिशन जैसी योजनाओं का निरीक्षण कर यह सुनिश्चित करने का कार्य किया कि समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े जनजातीय भाई-बहनों के संवैधानिक अधिकार जिनमें सड़क, पानी, शिक्षा भी सम्मिलित है, वे सारी कवायदें केवल कागजों तक सीमित न रहें।

• ‘स्वर्ण आंध्र’ और ‘विकसित भारत’ के बीच सेतु
एक राजनेता के रूप में पवन कल्याण ‘क्षेत्रीय अस्मिता’ और ‘राष्ट्रीय लक्ष्य’ के बीच सेतु का कार्य कर रहे हैं। उनका मानना है कि जब तक राज्य का जनजातीय क्षेत्र मुख्यधारा की पहुँच से नहीं आ जुड़ता, तब तक ‘स्वर्ण आंध्र’ की कल्पना साकार होने में संशय है। इस अवसर पर उन्होंने पुनः स्पष्ट किया कि ‘स्वर्ण आंध्र’ तभी बनेगा जब हमारे जनजातीय क्षेत्रों में ‘डोली’ (मरीजों को ले जाने वाली पालकी) की जगह पक्की सड़कों पर एम्बुलेंस दौड़ेगी। राज्य के दुर्गम क्षेत्रों में कनेक्टिविटी को दुरुस्त करने के लिए संपर्क मार्गों को बढ़ाते हुए 460 किमी से अधिक लम्बाई के सड़कों का निर्माण इसी दिशा में एक ठोस कदम है। आदिवासियों को विकास की प्रक्रिया में ‘साझेदार’ बनाकर, वे प्रधानमंत्री मोदी के ‘विकसित भारत’ के संकल्प को धरातल पर उतार रहे हैं। यह ‘टॉपर-डाउन’ अप्रोच के बजाय ‘बॉटम-अप’ विकास की राजनीति है।

स्वामी विवेकानंद ने जिस ‘त्यागी और सेवाभावी’ नेतृत्व की कल्पना की थी, पवन कल्याण उसे अपनी कार्यशैली में उतारते दिखते हैं। पवन कल्याण का यह स्थापना दिवस कार्यक्रम केवल आम लोगों के बीच जाकर एक उत्सव मनाना ही नहीं है, बल्कि हाशिए पर रहने वाले समुदायों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का प्रतीक है। ‘शेर की तरह खड़े हो जाओ और अपने गौरव की रक्षा करो’ सरीखे स्वामी विवेकानंद के संदेश को आत्मसात करते हुए, वे जनजातियों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। राजनीति में ‘ग्लैमर’ और ‘पॉपुलिज्म’ को दरकिनार कर, सुदूर जंगलों में जाना यह सिद्ध करता है कि वे वोट बैंक की नहीं, बल्कि परिवर्तन की राजनीति कर रहे हैं।

आदिवासी पुरखे बिरसा मुंडा का संदेश था – अपने पुरखों की संस्कृति, मूल्य और परंपरा को जिंदा करो! वहीं, संविधान सभा में जयपाल सिंह मुंडा ने आदिवासियों के अधिकारों और पहचान की वकालत करते हुए इस गौरवशाली संस्कृति को मुख्यधारा में लाने पर जोर दिया था। इसलिए यह माना जा सकता है कि शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वाभिमान ही आदिवासी विकास का मूल मंत्र है, जो संस्कृति की रक्षा करते हुए उन्हें मुख्यधारा से जोड़ेगा। पवन कल्याण का ‘गिरि-पुत्र संवाद’, ‘माता-मंती’, ‘अडवितल्ली बाटा’ आदि पहल जहाँ ‘स्वर्ण आंध्र’ की ओर एक सशक्त कदम और दुर्गम पहाड़ों से गूँजती ‘विकसित भारत’ की हुंकार सदृश है, वहीं उनका आदिवासियों के साथ जमीन पर बैठकर आत्मीयता से दोपहर का भोजन करना, जनसेना के सात सिद्धांतों में से एक ‘समानता’ और ‘बिना जाति-भेद की राजनीति’ के प्रति अटूट विश्वास को दर्शाता है।

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